Saturday, 28 November 2020

गड़ासरू महादेव

 "गड़ासरू महादेव हिमालय के बीच की कहानी "


                                    GADASRU MAHADEV LAKE                  

3:40 बजे प्रातः तारीख 12/08/ 2020 का वो वक्त था जब एक जिंदगी से परेशान आत्मा सामसमयिक विषय के सिलसिले में यू ट्यूब पर वीडियो देख रही थी  । अचानक एक ऊलजलूल सोच उसके मन में आयी कि एक कहानी लिखी जाए। जिसका नाम पहले से ही उसके शैतानी दिमाग में दस्तक दे चुका था। नाम था,"गड़ासरु महादेव हिमालय के बीच की कहानी। वो इंसान कोई और नहीं बल्कि मैं खुद था। बस फिर क्या था कहानी की तलाश थी और मुझे उस कहानी के लिए देश दुनिया से दूर पहाड़ों की सैर करने निकलना था। किस्मत ने भी साथ दिया पता चला गड़ासरू महादेव की यात्रा होने जा रही है। पवन जो की मेरे रिश्ते में चाचा लगते हैं। परंतु उम्र में भिन्नता कम होने की वजह से चाचा कम दोस्त ज्यादा लगते हैं। मैं उनकी करियाने की दुकान पर बैठकर उनसे इस बारे में बात कर रहा था कि तभी पंडित जी जो कि मेरे नाम राशि भी हैं वहां आ गए। हम दोनों ने उनसे राधा अष्टमी की तारीख के बारे में पूछा । तो उन्होंने बताया कि 26 अगस्त को राधा अष्टमी है और कुछ लोग इस बार 25 अगस्त को भी पवित्र स्नान करके वापिस आएंगे। क्योंकि पवित्र स्नान करने का समय दिनांक 25/8/20 दिन के 12 बजे से लेकर दिनांक 26/8/20 दिन के 12 बजे तक है। 
    अब मेरे सामने परेशानी ये थी कि छुट्टी का सीन कैसे एडजस्ट किया जाए। क्यूंकि मुझे 23  तारीख शाम तक अपने भंडारा बंधुओं को रिपोर्ट करना था। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि 22 तारीख को ड्यूटी से निकला जाए। और मैंने किया भी ऐसे। जैसे - तैसे छुट्टी करवाई और चल दिया। मैं इतना खुश था कि जो भी गाड़ी में था सबको बोल रहा था  भोले बाबा के दरबार में हाजरी लगाने चलो । दो घंटों के बाद 10:30 बजे के करीब मैं मैन मार्केट bhanjradu पहुंचा। जब मैं बाज़ार की तरफ आ रहा था तो मैंने अपने चचेरे भाई मिस्टर कूल  या यूं कह लो अगर मैं पहाड़ी बन्दा हूं तो वो पहाड़ी शटरबर्ग है।  हनी को कॉल की ताकि हम रास्ते के लिए कुछ खाने की जरूरी चीजें खरीद लें । वो तो मुझसे भी ज्यादा जल्दबाजी में था और मेरे से पहले मार्केट पहुंच गया था। उसने मेरे साथ एक ट्रैक मेहलवार यात्रा का भी किया था परन्तु किस्मत खराब होने की वजह से उसको हम अंजाम नहीं दे पाए थे और आधे रास्ते से वापिस आ गए थे। बाज़ार पहुंचने पर मैंने पहले उसको ही कॉल कि और उसने कहा कि में भाई के साथ तीसा हॉस्पिटल गया हूं बस आधे घंटे में आपके पास पहुंच जाऊंगा। वायदे के मुताबिक वो 20-25 मिनट में मेरे पास था क्यूंकि पहाड़ी बन्दे वायदे के बड़े पक्के होते हैं।  
   
      अब बात थी डिस्कसन करने की कि क्या - क्या सामान खरीदा जाए। हनी का कहना था कि भाई हमारे पास टेंट नहीं है तो पहले टेंट खरीदा जाए । मैंने कहा हनी आदि मानव को टेंट की क्या जरूरत है। पर वो नहीं माना और ले दे के उसने मुझे मना ही लिया और चार आदमियों वाला टेंट खरीदने का निर्णय लिया। हम टेंट की तलाश में निकल पड़े और हर उस दुकान पर पता किया जहां टेंट मिलता था। जब हम टेंट की तलाश में थे तो सुलाना गांव के पीयूष जो कि मेरा क्लासमेट था मिला। उसने हमें बताया कि टेंट हिमांशु की दुकान पर मिलेगा। हम अपना वक्त बर्बाद ना करते हुए वहां पहुंचे। हिमांशु की दुकान पर भी हमें बाबा जी का ठुल्लू मिला। उस वक़्त हनी कि शक्ल देखने लायक थी। हिमांशु का कहना था कि भाई मेरे पास एक टेंट बचा है और वो सिंगल लेयर है। इसलिए हमने निर्णय लिया कि " टेंट जाए भाड़ में हम चले पहाड़ में"। हिमांशु उसके बाद भी चंबा पता करता रहा पर वहां भी धेला मिला। उसने कहा भाई अगर टेंट मिल जाता है तो मैं कॉल करूंगा। हमने निर्णय लिया कि तब तक दूसरा सामान लिया जाए। हनी का ध्यान अभी भी टेंट की तरफ ही था इसलिए उसने मुझे सूरज को फोन करने को कहा कि शायद उसने अपना टेंट घर छोड़ा हो। सूरज भी महलवार यात्रा पर हमारे साथ था। उसका भी हमारे साथ आने का प्लान था पर पर्सनल प्रॉब्लम की वजह से उसे धर्मशाला जाना पड़ा इसलिए वो नहीं आ रहा था। उसने कहा भाई सॉरी मैं नहीं आ सकता और मेरा टेंट भी मेरे पास नहीं है। पर में किसी दोस्त को पूछता हूं । हम अपना सामान खरीदने में व्यस्त थे कि उस वक़्त सूरज का कॉल आया। मैंने एक सेकंड भी नहीं लगाया फोन उठाने को। उसने कहा डडवाल भी आ रहा ट्रेक को और उसके पास टेंट भी है। मैंने  डडवाल को फोन किया उसका फोन नहीं लगा इसलिए मैंने उसको वॉट्सएप पर msg किया कि मुझे बैक कॉल करे। 10 से 12 मिनट में उसने मुझे कॉल किया। उसने मुझे कहा कि मुझे एक घंटा दो रेडी होने के लिए। उसे मैंने जल्दी से जल्दी आने को कहा क्यूंकि सिहुंता से उसे कम से कम पांच घंटे का सफर तय करके तीसा पहुंचना था और समय दो बज रहे थे। मैंने उसे कहा कि डोगरे को भी साथ ले आए क्यूंकि वो भी एक ख़ास बन्दा है। अब अगर मैं डोगरे  और डडवाल की कहानी सुनाने बैठूंगा तो जिस कहानी को में लिखने जा रहा हूं वो कभी पूरी नहीं होगी इसलिए मैं सिर्फ डोगरे की एक फेवरेट लाइन सुनाना चाहता हूं " शंभू तुझे पता है हिमाचल पुलिस में डोगरा नाम बजता है " 😃😃)। डडवाल ने कहा मैं बोलता हूं उसको और आप भी कॉल कर लो उसे। मैंने डोगरे को फोन किया तो वो आनाकानी करने लगा। मम्मी  नहीं मानेंगे बगैरा वगैरा। मैंने कहा मम्मी से बात करवा और मैंने आंटी को मना लिया। अब मैं और हनी घर चले गए और उनका इंतजार करने लगे। शाम के पांच बजे डडवाल ने फोन किया कि वो निकल रहे हैं और उनके साथ दो और बन्दे हैं। हम कुल मिलाकर छे बन्दे हो गए थे। इधर  हमारी जनसंख्या बढ़ती जा रही थी और उधर हनी कि चिंता कि एक तम्बू में इतनी जनसंख्या आयेगी कैसे । सच में एक बिहारिए और एक चंडीगढ़िए को कन्विंस करना बहुत ही मुश्किल काम है। मैंने उसे कहा मैं तरपौल ले चलता हूं और एक तरपाल का टेंट लगा लेंगे और एडजस्ट कर लेंगे। 
 शाम के साढ़े छः बजे के करीब मेरे मामाजी के लड़के द ग्रेट निहाल का कॉल आया। आप सब हैरान होंगे मैंने ये नाम उसको क्यों दिया क्यूंकि वो एक ऐसा बन्दा है जो जिस भी बन्दे से मिलता है वो निहाल का कायल हो जाता है। उसकी हर एक बात दिल से निकलती है और दिल को छू जाती है। आपको उसकी बातें बाद में सुन ने को मिलेंगी जब वो हमें ज्वाइन करेगा। और एक बात जो मैं उसके बारे में बताना भूल गया वो एक अच्छा मजाकिया है।

 मैं और मेरी मोहतरमा  दोस्तों के खाने का अरेंजमेंट करने में व्यस्त हो गए। मैंने उसका काम में हाथ बंटाया। शाम के साढ़े आठ बजे जब मैंने और हनी ने सारी पैकिंग की तो मेहमानों को कॉल करने का निर्णय लिया। मैंने डोगरा और डडवाल को कॉल किया। उन्होंने कॉल नहीं उठाई। हालांकि थोड़ी देर बाद उनकी बैक कॉल आई। डोगरा अभी भी सारे प्लान की मां बहन कर रहा था और उसका मन नहीं था आने का इसलिए वो डडवाल और विवेक को बिना बताए आधे रास्ते से मूड गया। वो चिंतित थे क्यूंकि वो कॉल नहीं उठा रहा था और पीछे रह गया था। एक घंटे की लगातार कॉल्स के बाद बडी मुश्किल से उसने कॉल उठाई। कसम से इतने कॉल्स तो मैंने अपनी अर्धांगिनी को नहीं किए होंगे  जितने मैंने उस दिन उसको किए। उसने कहा मैं वापिस चला गया मेरे मुंह से तीन ही शब्द निकले भाड़ में जा और फोन काट दिया। मैंने डडवाल को कॉल किया कि विवेक और वो तीसा आ जाएं। वो काफी लेट हो चुके थे इसलिए उन्होंने खाना भी रास्ते में खाया। जैसे - तैसे रात के पौने एक बजे वो मेरे घर पहुंचे। मैं और हनी अभी भी इंतजार कर रहे थे और उनको खाना खाने को बोला। उन्होंने थोडा सा खाना खाया। खाना खाते टाईम रणनीति बनी कि सुबह पांच बजे तक निकल पड़ेंगे ताकि कमर तोड़ देने वाली चढ़ाई का फासला थोडा कम हो। हमने एक दूसरे को शुभ रात्रि बोला और अपने अपने कमरे में सो गए। 
     
# पहला दिन -
  सुबह पांच बजकर बीस मिनट पर मैं उठा और बिना वक़्त गंवाए बाथरूम की ओर दौड़ा और सुबह का शौच किए बगैर ही नहाने लग पड़ा क्यूंकि मुझे लग रहा था कि मेरे साथी इस वक़्त तक तैयार हो चुके होंगे। नहाने के बाद मैंने उनको कॉल किया परंतु वो महानुभाव अभी बासियां मार रहे थे। चाची जी ने सुबह का खाना तैयार किया और हम करीब सवा सात बजे निकल पड़े। हमारे एक हाथ में धूप की बत्तियां थी तो दूसरे में छड़ थी और पीठ पर  पच्चीस - पच्चीस किलो के बैग। हमने ऊपर कि और चढ़ाई शुरू कर दी और जैसे - जैसे हम ऊपर की ओर जाते रहे हमारी एक दूसरे से कलोल करना भी शुरू हो गई। 
 कुछ ऊपर जाने पर हम अल्यानी गांव पहुंचे। हमने वहां पर अपना कीमती समान लिया। अब वो कीमती था इसको कोई महान आत्मा ही बयां कर सकती है। अब हम ऊपर की ओर चल पड़े और देहरी नाग मंदिर के पास रुकने का निर्णय लिया। ऊपर चढ़ते वक़्त डडवाल पीछे चला था और हम सभी उसकी खिंचाई करने लग पड़े और वापिस मुड़ने को कहने लगे।  उसने हमारी बात को ऐसे इग्नोर किया जैसे नई नवेली दुल्हन अरेंज मैरिज के बाद अपने दूल्हे को करती है। वो एक अच्छा प्रकृति प्रेमी है और अपने काम को बखूबी करना जानता है। हमारा प्लान था कि हम देहरी नाग मंदिर के सामने नाश्ता करें परन्तु जब हम वहां पहुंचे तो प्लान को बदलते देर नहीं लगी। सबका यही फैसला था कि एक छोटी सी पहाड़ी और चढ़ी जाए और ऊपर जमोठ नामक जगह पर अध्वारी/दुधारी में रुका जाए तथा ब्रेकफास्ट के साथ लस्सी का सेवन भी किया जाए। हमने देहरी मंदिर में सिर्फ धूप जलाया और  ऊपर की ओर चल दिए। पंद्रह मिनट में हम जामोठ में थे। हमने आंटी से लस्सी मांगी। उन्होंने हमें लस्सी के साथ - साथ मिर्च और नमक भी फ्री दिया। जब वो हमें लस्सी दे रही थी तो उन्होंने कहा कि खाना भी बना है खा लो। हमने कहा आंटी हम घर से ले आए हैं। जब हम खुले आसमान के नीचे नाश्ते का आनंद ले रहे थे तो उसी वक़्त मेरी नजर नीचे देहरी कि तरफ गई और मेरे मुंह से जोर से जय भोले निकला क्यूंकि सामने से जो आ रहा था वो था द ग्रेट निहाल सिंह। निहाल ने जोर से जवाब दिया जय भोले। ऐसा लग रहा था मानो उसे लक्ष्य की प्राप्ति हो गई है। वो जल्दी से ऊपर  आया और हम सबने नाश्ता खत्म किया। अब मैं और हनी अपनी आगे की यात्रा जारी करना चाहते थे परंतु डडवाल, विवेक और निहाल बाबा जी की बूटी के कश मारना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भांग कि बीड़ी बनाना शुरू की। इसी बीच आंटी वहां आ गए।
   उन्होंने निहाल से कहा बीड़ी पिया कर खैनी मत खाया कर।
  निहाल ने मजाकिया सुर में उतर दिया " खैनी तो खाता नहीं मैं जिंदगी में कभी। 
  फिर आंटी ने कहा भांग क्यों पी रहे हो। 
  निहाल का जवाब था ये भांग नहीं है। ये तो शिव जी की बूटी है।
 हम सब फिर से अपनी हंसी रोक नहीं पाए और मैंने बीच में बात काट दी और कहा निहाल की तरह इसकी बातें भी निहाल हैं।

शंंख बजाने के लिए असीम ज़ोर लगाते 

मेरा छाया चित्र pic by : honey singh

 

डाडवाल  ए की तरह एक हाथ में बीड़ी लिए था ओर दूसरे हाथ से फोन चला रहा था। निहाल, विवेक के साथ बातें करने में व्यस्त था और कह रहा था "मेरी हर यात्रा किसी ना किसी नए चेहरे के साथ होती है तथा पुराने चेहरे याद करते हैं कि निहाल नहीं आया इस बार हमारे साथ"। कहीं ना कहीं उसके कहने का मतलब ये था कि जो बन्दा उस से मिलता है  याद करता रहता है। 

मैंने हनी को मेरी तस्वीर खींचने को कहा जब मैं शंख बजा रहा था और हनी ने वैसा ही किया। डडवाल ने बीड़ी विवेक को पास की और वहां आध्वारी में छोटे बच्चों की फोटो खींचने में व्यस्त हो गया। उसी बीच विवेक ने बीड़ी निहाल को पास की। निहाल ने एक कश मारा और चिल्लाया "शंभू शंकर"। वो मुझे बीड़ी पास करना चाहता था। मैंने उसे मना किया क्यूंकि मैं इसका आदि नहीं हूं। उन्होंने जबरदस्ती मुझे पिलाया कि भोले के दरबार जा रहे हैं ये तो चलेगा। निहाल ने कहा तुम ऐसी जगह जा रहे हो जहां बाकी कोई मदद करे या ना करे भांग जरूर करेगी। मैंने डरी हुई दुल्हन की तरह बीड़ी को हाथ में लिया और एक कश के बाद विवेक को पास कर दी । थोड़ी देर बाद मैं सातवें आसमान पर था। मैंने कहा अब हमें चलना चाहिए। सबकी यही राय थी। मैंने जयकारा लगाया : 
 "फिर बोले गडासरू महादेव की "
 सबका जवाब था  "जय" 
दूसरा जयकारा मेरे मुंह से निकला 
"फिर बोले नीले गगने की" 
उनका फिर जवाब था "जय"।
 कुछ और जयकारों के साथ हम आगे बढ़े। आगे बढ़ने पर एक और छोटी सी पहाड़ी के बाद थोडा समतल मैदान आया और हम चोरोठ पहुंच गए। पता नहीं इसका नाम कैसे पड़ा परंतु मेरी बुद्धि तो यही कहती है कि किसी जमाने में ये चोरों और लुटेरों का वास होना। वहां हमने थोड़ी देर आराम किया व पानी पिया। अंकल आंटी ने वहां हमें लस्सी पीने को कहा। आध्वारि में ये प्रचलन है कि पानी को बन्दा पूछे ना पूछे लस्सी को जरूर पूछेगा। हमने वो लस्सी ऊपर ले जाने का फैसला किया और एक बोतल में भर ली। हम वहां से चल दिए। निहाल तो मस्त मलंग कि तरह भोले के खयालों में खोया था और भोले बाबा के भजन गाए जा रहा था। मैं शंख बजाने में मगन था। हनी की तो क्या बात कहें उसको बोलने कि जरूरत ही नहीं थी कि वो क्या करे। जैसा कि आपको मैंने बताया उसका फोटोग्राफी में लैला मजनू वाला सीन है तो वो उसमें मस्त था। विवेक कह रहा था ये उसका चंबा का पहला ट्रेक है तो उसको एन्जॉय कर रहा था। डडवाल अभी भी पीछे ही था। मुझे अब उसकी चिंता होने लगी थी पर उसको पता था कैसे पहाड़ों की सैर की जाती है। 
मैंने उसे मजाकिया सुर में कहा "डडवाल क्या हुआ एक प्रोफेशनल हाइकर आज ढेर हो गया। 
उसने जवाब दिया "ये तो अपना स्टाइल है जानी" 
बीच में हनी ने मेरी बात काटते हुए डडवाल का होंसला बढ़ाया और कहा भाई आप फालतू में बन्दे का मोराल डाउन कर रहे हो वो जनता है कैसे चढ़ना है।
मेरा मन थोडा शांत हुआ पर फिर भी टेंशन थी कि क्या डडवाल पहुंच पाएगा ?
 जानने के लिए पढिए आगे 
  हम लगातार चलते गए ओर वन में पहुंच गए। वान, देवदार और चील के पेड़ जो ठंडक का आनंद दे रहे थे कसम से वो लुगाई के साथ रात को सोने में भी नसीब नहीं होता । थोडा दूर जाने पर हमें अपने गांव वाले भी मिले। हमें देख कर उनका जोश बॉर्डर मूवी के सुनील शेट्टी की तरह  बढ़ गया और वो जोर जोर से जयकारा भरने लगे। हमने भी उनके जयकारों के जवाब में कोई कोताही नहीं बरती। तभी हनी के ड्रामे फिर से शुरू हो गए ऐसा लग रहा था कि जैसे उसको टट्टी लगी हुई थी और मेरा सोचना सही था। मैं इस से पहले जुबान के ताले खोलता वो बोल पड़ा भाई अब जल्दी पहुंचने के चक्कर में टट्टी भी ना करें। आप लोग सोच रहे होंगे मुझे इतनी जल्दी क्यों लगी थी तो मैं आपको बता दूं कि हमें शाम तक अपने भंडारा बंधुओं को रिपोर्ट करना था क्यूंकि सेवा भी करनी थी अगले दिन।  
निहाल ने भी उसका वोट बढ़ाया और कहा "कूल डाउन जेंटलमैन रात अपनी है हम पहुंच ही जाएंगे"। हमने वहां थोडा आराम फरमाने और बीड़ी पीने का फैसला लिया। निहाल का तो यहां तक कहना था कि एक भांग की बीड़ी बनाई जाए पर सबने ने उसको रोका और आगे बढ़ने को कहा। 
        जैसे - जैसे हम ऊपर की ओर बढ़ते गए हमें और लोग जो कि दूसरी तरफ से आ रहे थे मिलने लगे। इस बार लोगों की जनसंख्या देख कर ऐसा लग रहा था जैसे  गड़ासारु महादेव की यात्रा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की हो गई हो। चारों तरफ से लोग उस जगह पर इकट्ठा हो रहे थे जहां से देवी कोठी माता का मंदिर सामने दिखाई दे रहा था। लोग तो भोलेनाथ के दीवाने होते जा रहे थे। हर किसी के मुंह से भोले बाबा का जयकारा सुनाई दे रहा था। जिसकी ऊपर चड़ते वक़्त  धड़कन 200 km प्रति घंटा की स्पीड से चल रही थी वो भी ओम नमः शिवाय तो जरूर बोल रहा था। जहां से देवी कोठी मंदिर दिखता है वहां पर हर कोई धूप जला रहा था। आस्था ऐसी कि मानो सारा संसार ही नशवर हो गया हो। निहाल पंद्रह मील प्रति घंटे की रफ्तार पकड़े हुए था और हम ठहरे कछुए। मैंने उसको चेस करने की नाकाम  कोशिश की। डडवाल, हनी और विवेक तो काफी पीछे छूट गए थे। धुंध काफी फैल चुकी थी और वो तीनों महानुभाव अब दिखना बन्द हो गए। मैंने उनको जोर से आवाज लगाई। उन्होंने कहा भाई आ रहे हैं। मैंने कहा रेंगते हुए या चलते हुए। उनका उतर था फिलहाल तो चल रहे हैं आगे पता नहीं। ज्वाला धार अब थोड़ी ही दूर बचा था। वहां दो भंडारे लगे हुए थे। जैसे ही हम वहां पहुंचे कुवारविं गांव की भंडारा पार्टी ने सेवा में कसर नहीं छोड़ी। करीब एक बजे हम वहां पहुंचे। मैंने अपना बैग अपने थके हुए कंधो से नीचे उतारा। फेफड़े गैस के गुब्बारे बन चुके थे। थोड़ी देर तक तो मैं मृत शय्या की तरह पड़ा रहा। थोडा आराम करने के बाद पानी पिया। तभी हमारी पैदल सेना भी वहां पहुंच गई। हनी और विवेक की  स्थिति तो कुछ सामान्य थी पर हमारे डडवाल की स्थिति जॉनी भईया की तरह हो गई थी जो एक स्पैल के बाद पसीने से तार तार हो जाता है। उस वक़्त उसका गंजा सिर ऐसे चमक रहा था मानो साक्षात् सूर्य ही वहां बैठकर  रोशनी दे रहा हो । निहाल अपनी धुन में गए जा रहा था और लोग उसको ऐसे देख रहे थे जैसे कोई एलियन धरती पर आ गया हो और उड़धांग मचा रहा हो। हनी फोटोग्राफी में मस्त था। थोड़ी देर बाद चाय और चने का स्वाद चखने को मिला। हमने जब अपना थोडा बहोत पेट भरा तो हमारी हिम्मत नहीं हुई उठने की इसलिए मगरमच्छों की तरह आधे घंटे तक पड़े रहे। निहाल को तो जैसे मौका मिल गया एक ओर भांग की बीड़ी बनाने का। पहला कश , फिर दूसरा और जब तीसरा कश उसके गले से उतरा तो उसके मुंह से जोर से आवाज निकली "शंभू लगा दे बारह मास के तम्बू "। मेरा सोचना ये था कि शायद निहाल की बात भोले बाबा सुन ले क्यूंकि ऐसी जगह पर बारह महीने काटना किसी ऐसे बन्दे को नसीब हो जो साक्षात् भोले बाबा के पैर छू कर आया हो। तभी अचानक से निहाल उठा और हम सबको कहने लगा चलो अब चलते हैं। डडवाल भी जॉनी भईया की तरह दूसरे स्पैल के लिए तैयार था। अब हमारा अगला लक्ष्य रुखो सुखो था जो कि किसी भी यात्री का अगला पिछला एक करने वाला था क्यूंकि वहां पर चढ़ाई के साथ साथ जड़ी बूटियों का खेल भी शुरू होने वाला था। किसी ने सच कहा है " ये तो  रूखो सूखो है वो हूडान कैसी है"। मुझे डर था क्यूंकि निहाल और मुझे छोड़कर हमारे तीन महारथी पहली बार यात्रा कर रहे थे और आपने हमारे जॉनी भईया की हालत तो देख ही ली । परंतु रेंगते रेंगते वो भी रुखो सुखो की चढ़ाई चढ़ ही गए। हमने वहां पहुंचकर भोले बाबा का धूप जलाकर शुक्रगुजार किया और चलने की तैयारी करने लगे क्यूंकि निहाल की बेसब्री और भी बढ़ती जा रही थी। डडवाल ने तुरंत ही टोक दिया। भाई साहब इतनी भी क्या जल्दी है एक भांग का पेपर तो बनता है यहां भी। निहाल भला कैसे मना करता उसने भी कह दिया चलने दो। मेरी, हनी और विवेक की तो कोन सुनता। एक पेपर फट से तैयार हो गया और इस बार मुझे ही शुरुआत करने का जिम्मा सौंपा। मैंने भी इस बार कोई कसर नहीं छोड़ी आखिरकार भोले की नगरी में प्रवेश जो कर लिया था और आसमान ऐसे घूमने लगा जैसे मानो सारी पृथ्वी मेरे इर्द गिर्द ही घूम रही हो। निहाल, विवेक और डडवाल ने भी जल्दी जल्दी कश मारे और सबने चलने की सोची। वहां से चलने के बाद हम करीब सवा चार बजे नौसरा धार पहुंचे।डडवाल और हनी का कहना था यहां भंडारे में खाना खाया जाए और आज रात का विश्राम यहां किया जाए। परंतु निहाल और मेरे प्राण तो पहले ही हुडान में अटके हुए थे। इसलिए फैसला ये हुआ कि कमजोर पार्टी वहां रुके और अगले दिन हमें ज्वाइन करे। मैंने और निहाल ने वहां से निकलने में ज्यादा वक़्त नहीं लगाया और फटाफट उनको टेंट लगाने के लिए जगह ढूंढी और अगले पड़ाव की ओर चल दिए। निहाल की स्पीड का लेवल अब हाइ होता जा रहा था इतना जल्दी तो मोबाइल फोन का ऐप अपग्रेड नहीं होती जितना जल्दी निहाल की स्पीड अपग्रेड हो रही थी। मैंने उसे थोड़ा रुकने को कहा उसने कहा हम हूडान के निचले सिरे पर आराम करेंगे और अगला रेस्ट टॉप पर होगा। थोड़ी देर के लिए तो मेरा सर चकराया की एक बन्दा जो सड़क में पैदल चलने में ढीला है वो एक ही रेस्ट में हुडान की 3000 मीटर ऊंची चोटी चढ़ जाएगा। पर हमारे यहां कहावत है " असली मर्द का पता पहाड़ों की चढ़ाई करते वक़्त चलता है"। कुछ दूर तक ऊपर चलने पर हम अधाम के गोठ पहुंचे। इसका नाम आधाम इसलिए पड़ा क्यूंकि ज्यादातर लोग यहां पर आधी यात्रा ख़तम कर पहली रात विश्राम करते हैं। आधे रास्ते को चुराही में अधाम्म बोलते हैं। करीब चालीस से पैंतालीस मिनट के बाद हम रेंगते हुए और अधामा के गोठ की पथरीली खड़ी चढ़ाई को पार करके हुडान के निचले सिरे पर पहुंचे। वहां पर हमने विश्राम किया। भूख तो लाजमी थी इसलिए मैंने अपना बैग खोला, काकड़ी  बिस्कुट लिए और खाने लगे। निहाल खाते खाते ही बोल पड़ा " ब्रदर अगर हम इस स्पीड से चले तो हम साढ़े सात और सात चालीस तक टॉप पर होंगे। अब मेरी हालत जॉनी भईया से बदतर हो गई थी और हमें इस सफर की सबसे ख़तरनाक चढ़ाई चढ़नी थी। अगर उस वक़्त मेरा बस चलता तो मैं वहां तम्बू गाड़ देता और दुनियादारी भाड़ में जाने देता परंतु निहाल कहां मानने वाला था बोलता खेल (ग्रांही) आने वाली है मुझे। पहले तो मुझे उसकी बात मजाक लगी पर जब वो धूप कि बत्ती जलाकर त्रिशूल पर लगाने लगा तो कुछ मेरा दिमाग सनका। मैंने सोचा भईया काम खराब है चलने में भलाई है। 
निहाल कुछ रुका और बीड़ी निकालकर पीने लगा और मुझे भी एक दो कश दिए। इस से पहले मैं बीड़ी बुझाता निहाल ने फिर से अपनी स्पीड पकड़ ली। मुझे अभी भी याद है जब वो बीड़ी  सुलगा रहा था तो लाइटर काम नहीं कर रहा था। उसने मुझे पूछा ये लाइटर काम क्यों नहीं कर रहा। मैंने भी कह दिया "भईया इसे भी ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है जैसे हमें इसलिए धीरे - धीरे चलो" । परंतु निहाल के जवाब तो नेक्स्ट लेवल के होते हैं उसने भी जवाब दे दिया "कूल डाउन जेंटलमैन रात अपनी है मज़े से चलते हैं"। हमने बीच में एक आध शॉर्टकट भी अपनाया ताकि खड़ी चढ़ाई को और कम किया जा सके। इन शॉर्टकट्स  से हमने एक घंटे का रास्ता महज दस से पंद्रह मिनट में चढ़ लिया। मैंने उसको कहा थोडा सांस थाम लेते हैं उसने कहा धीरे से चढ़ते रहो। उसके और मेरे बीच की दूरी बढ़कर तीन सौ मीटर हो गई थी। आधी चढ़ाई चढ़ने के बाद एक खड़ी पथरीली चढ़ाई सामने आ गई। मैंने भी जल्दी जल्दी अपने पैर आगे बढ़ाए और निहाल से कुछ फासला कम किया और पथरीली चढ़ाई ख़तम होने से पहले उसके पास पहुंच गया। अब हुडान चोटी की कुछ चोटियां हमें नजर आने लगी। हमने अपना सफर जारी रखा। छोटी सी पहाड़ी चढ़ने के बाद हमें हुडान चोटी पर कुछ मानुष दिखाई दिए। मैने अपनी सांसों को कंट्रोल किया और शंख बजाना शुरू किया। निहाल तो रुकने का नाम नहीं ले रहा था अब मुझे उसकी हिस्ट्री जियोग्राफी कुछ समझ आ रही थी। ऊपर से शंख ध्वनि में उत्तर आया । तीन - चार वन मानुष जो ऊपर से ऐसे देख रहे थे जैसे  वानर दल राम लक्ष्मण को आते देखते है । जब तक मैं लड़खड़ाता हुआ ऊपर पहुंचा तब तक निहाल शिव तांडव कर रहा था । उसमें ये शक्ति कहां से आई ये तो वो और भोलेनाथ जी ही जानते हैं । मैं तो बस वही जनता हूं कि निहाल ने कंपकंपाहट में वहां पड़ा लकड़ी का बर्तन उठाया उसमें जो पानी दूध चढ़ाया जाता है उसे ऐसे पिया जैसे अपनी बारह बरसों की प्यास बुझा रहा हो । त्रिशूल पर लगाए धूप के धुएं को ऐसे कश लगा रहा था जैसे भोले बाबा को भांग की कम्मी पड़ गई हो अरे होगी क्यों ना पृथ्वी पर इतने सारे बन्दे इसकी शोर्टेज महसूस जो कर रहे हैं । उसने त्रिशूल के साथ शिव तांडव किया । उसके शिव तांडव को देख कर ऐसे लग रहा था जैसे साक्षात् भोलेनाथ प्रकट हो गए हों । 
            
              हूडान गलू के बारे में एक लोकगाथा है कि एक बार एक भेड़पालक अपनी भेड़ों को उसी रास्ते से पांगी घाटी की ओर जा रहा था।  चारों तरफ पथरीली चोटी होने की वजह से उसे आगे जाने का रास्ता नहीं मिल रहा था । तभी उसकी भेड़ों मैं से एक नर भेड़ जिसे स्थानीय भाषा में हुडड कहा जाता है उसने पता नहीं कहां से शिलाजीत खाई कि उसको जोश आ गया और दे मारी टक्कर पहाड़ की चोटी को । फिर क्या था भेड़ों और भेड़पालक को रास्ता मिल गया और हुडड की तब से आज तक वहां पर पूजा की जाती है । तब से इस जगह का नाम भी "हुडान" जिसे दूसरे शब्दों में हुडा गलू भी कहा जाता है । जो कोई भी वहां पहुंचता है सबसे पहले वहां धूप जला कर उस नर भेड़ की पूजा की जाती है और काफी आराम करने के बाद वहां हमारे भंडारे का आनंद लेकर आगे की यात्रा खुशी - खुशी भोले कि जयकार लगाते हुए जाता है । कुछ साल पहले हमारे भाईचारा मंडली द्वारा इस यात्रा के लिए भंडारा करने की योजना बनाई । हुडॉन से अच्छी जगह हमें कहीं नहीं दिखाई दी क्योंकि यहां पहुंचते ही यात्री इतने थक चुके होते हैं कि अगर उन्हें पानी भी पीला दिया जाए तो इस से बड़ी लोक सेवा और क्या होगी इस संसार में ।
 कुछ देर निहाल के शिव तांडव के बाद माहौल कुछ ठंडा हुआ परंतु वो ठंडक कुछ ही देर की थी क्यूंकि वहां तो अखाड़ी से भी महा अखाड़ी मालची बैठे हुए थे जिन्होंने जमा देने वाली ठंड में भी माहौल को गरम बनाए रखा हुआ था । धन्य है भोलेनाथ जिन्होंने ऐसी महान आत्माओं से मिलने का सौभाग्य दिया हमें । वहां पहुंचते ही सबसे पहले भाईचारे से मिले फेर बारी थी भोजन से मिलने की क्यूंकि पेट में चूहों की जगह अब घोड़े दौड़ रहे थे । उस दिन बनी खिचड़ी ने तो केएफसी को पीछे छोड़ दिया। हमने खिचड़ी ऐसे खाई कि मानो उंगलियां ही खा लें। बाद में रंगारंग प्रोग्राम शुरू हो गया । चिलमी बावे रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। चिलम पे चिलम बीड़ी पे बीड़ी कुछ टाईम तो ऐसा लगा कि मानो हम तम्बू में नहीं किसी शमशान घाट पर बैठे हैं और बातें सबकी तीसरे लेवल की चल रही थी । सबने बुद्धिजीवियों को पीछे छोड़ दिया था । ऐसा लग रहा था मानो मोदी जी भी इनके सामने कुछ नहीं हैं । रात के करीब दस बज रहे थे तो शरीर ने भी जवाब देना शुरू कर दिया था । मैंने सोने का प्लान बनाया ही था कि सबने शोरगुल शुरू कर दिया की भोले बाबा को बुलाया जाए। निहाल की तो ये सुन कर थकान ही ख़तम हो गई । उसने कहा मुझे एक डब्बा पकड़ा दो में इसकी ढोलकी बनता हूं । फिर क्या था भजन कीर्तन शुरू हो गया। निहाल भजनों में ऐसा रमाया कि ना तो उसको वक़्त का पता चला ना हमें । रात के करीब दो बज रहे थे । निहाल को कंपकंपी शुरू हो गई । किसी ने बीच में कहा धूप जलाओ ! धूप जलाओ! । भूपी भाई ने जल्दी से धूप जलाया और निहाल सिंह ने धूप का धुंआ ऐसे मुंह में लिया जैसे भांग की सीकें लगा रहा हो । निहाल के अंदर से आवाज आई बम भोले , जय शंकर । मैं खुश हूं सब पर मेरे दरबार मैं आप लोगों ने लंगर लगाया मैं सबपे खुश हूं पर वक़्त ज्यादा हो गया है तो सो जाओ आपको मेरी स्तुति करने का मौका मिलेगा । वो दो मिनट ऐसे थे मानो साक्षात् भोलेनाथ उसके कंठ से बोल रहे हों । करीब दो मिनट के बाद निहाल शांत हुआ और सबकी यही राय थी कि अब सोया जाए सुबह जल्दी उठ कर सारा लंगर का काम करना है । बिस्तर  पर पड़ते ही मैं तो सातवें आसमान पर था और शायद बाकी भी । 
दूसरा दिन : 
सुबह साढ़े पांच बजे मेरे कानों में आवाज आई सारे उठ जाओ लोग ऊपर की ओर चड़ने लगे हैं और सारा काम करना अभी बाकी है । पवन और मैं एकसाथ उठे । बाकी भी धीरे  - धीरे उठने लगे । पवन ने मुझे कहा जो पानी बर्फ को गलाकर इकठ्ठा हुआ है उसको ले कर आओ । जब मैंने वहां जाकर तांत्रा देखा तो मैं हैरान हुआ। एक तरपौल ऊपर से ढलान पर रखी हुई थी जिसके ऊपर वाले सिरे पर बर्फ की ढेलियां रखी थी जो पिघलकर पानी के रूप में निचले सिरे पर इकठ्ठा हो रही थी । तभी तो कहते हैं " पहाडिए जुगाडु होते हैं " । रात भर का इकठ्ठा पानी जो कि दो - तीन पंद्रह लीटर के डब्बे थे मैंने उनको भरा और पवन चाचे के पास पहुंचाया । उन्होंने अपना काम फटाफट शुरू कर दिया और पानी गरम करना शुरू कर दिया । तब तक सारे चिल्मी यार उठ चुके थे । सबको उनकी ड्यूटी मिल चुकी थी और मेरे साथ भूपी भाई, राणा जटाधारी, बबलू , नंदू मिलाकर पूरी टीम तैयार थी । भूपी भाई ने कहा ठीक है हम आईपीएच डिपार्टमेंट का काम संभालेंगे और पानी की कोई कमी नहीं होगी । चाय बनाने वाली टीम में पवन चाचा , खेम भाई  , बिट्टू  भाई, थे । बाद में जनसंख्या बढ़ने पर एक बन्दा जो अगले दिन आया उनके साथ जोड़ा गया । उसका नाम था " धर्मेन्द्र" । बन्दा काम में एक्स्पर्ट था " । खैर छोड़ो अपनी स्टोरी को गति प्रदान करते हुए आगे बढ़ते हैं । हमारी अगली पार्टी थी चाय, बिस्कुट और पानी सर्व करने वाली पार्टी जिसके हेड थे अपने मामाश्री "किशोरी" । वैसे तो रिश्ते में वो मेरा भांजा लगता है  पर हम उम्र और सहपाठी होने की वजह से वो मुझे माम बोलता है और में भी उसको माम बोलता हूं । अरे बोलू कैसे नहीं बचपन का याराना जो है । मामाश्री के साथ राजू (रिश्ते में मामाश्री), मुकेश , मानसिंह, पवन 2 और बाकी दो तीन लड़के और थे उनका नाम शायद मैं नहीं जानता । अगली पार्टी थी टेंट से बिस्कुट गिलास डिस्ट्रीब्यूटर्स की जिसमें सूखा भाई जो कि चंबा से 70km तीसा पहुंचकर हमारे साथ गड़ासरू महादेव के आशीर्वाद से वहां पहुंचे थे । उनके साथ भी दो तीन लोंडे थे जिनका नाम मेरे जेहन में नहीं है । जैसे - जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता गया और बर्फ थोड़ी कम होती गई भूपी भाई ने हमारी पार्टी से कहा एक चक्कर बर्फ ढोने को लगाते हैं । तब तक हमारी सारी पार्टी सुट्टा लगाकर सेट हो चुके थी ।  सबने अपनी - अपनी बोरी उठाई और लंगर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर बर्फ के ग्लेशियर की और चल दिए । वहां से बर्फ तोड़कर बोरी में भरी और वापस आ गए और मैंने जो पानी इकठ्ठा हुआ था डब्बों में भरा । बबलू ने उसे आगे पहुंचाया । तब तक रश काफी हो गया था तो भूपी भाई सुट्टे के सरूर में चाय पानी सर्व करने चले गए । अरे एक खास बन्दे के बारे में बताना तो भूल गया ' निहाल ' । उसे हमने नीचे पूजा वाले स्थान पर छोड़ा था ताकि कोई भी चेला खेल ( हमारी भाषा में खेल को ग्रान्ही कहते है ) आए उसे निहाल संभाले पर जब मेरी नजर नीचे पड़ी तो दो तीन बन्दे निहाल को ही संभाल रहे थे क्योंकि खेल ( ग्रानही) उसे भी आ रही थी । ऊपर से नज़ारा देख रहे राणा जटाधारी जैसे महाष्यों का तो यही कहना था कि ये खेल - खूल कुछ भी नहीं है बल्कि एक पागलपन है । उसकी बात को सुन कर उस पर कुछ पल तक मुझे विश्वास भी हुआ पर फिर सोचा ऐसी जगह पर ये संभव हो सकता है । दिन चढ़ता जा रहा था एक के बाद एक श्रद्धालु ऊपर चढ़ रहे थे और हमारे हाथों की बनी चाय की चुस्कियों का अनांद ले रहे थे । अरे लें भी क्यों नहीं ऐसी ठंडी जगह पर और खड़ी पहाड़ी चढ़ कर तो चाय ना पीने वाला भी चाय की ख्वाइश करे । ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं खुद चाय कम पीता हूं पर आप लोग मानोगे नहीं मैंने उन तीन - चार दिनों में पूरे साल भर की बीड़ियां और चाय पी । शाम का वक्त हो चला था और हमने करीब पांच बार बरफ ढोई । मैंने थोड़ी देर चाय पानी सर्व करने की सोची । दो तीन बार जाने के बाद मैंने जाना बन्द कर दिया । जाने पहचाने लोग भांग के नशे में ऐसे लग रहे थे जैसे कोई अनजान व्यक्ति मुझे घूर  रहे हों । फिर आकर थोड़ी देर तक पवन चाचे के पास बैठा । काफी देर बाद बड़ी  मशक्तत के बाद मेरा मुंह खुला और मैंने पवन चाचे से पूछा । कितने बन्दे क्रॉस कर गए आपके हिसाब से ।
 उन्होंने भी नशीली अवाज में जवाब दिया तीन हज़ार के करीब । 
 मैंने हैरानी से कहा एक दिन में तीन हज़ार । 
 उन्होंने कहा ढाई हज़ार गिलास लग गए और कुछ ने चाय नहीं पी तो कुल मिलाकर तीन हज़ार के करीब।
 मैंने कहा ये तो मणिमहेश डल यात्रा का भी रिकॉर्ड टूट गया सोचो अगर ये यात्रा भी मणिमहेश की तरह पूरा महीना चले तो ।
 पवन चाचे का चिल्मि जवाब था " आयेगा बेटा वो वक़्त भी" और तब हम ये चाय का लंगर थोड़ी लगाएंगे पूरे खाने की व्यवस्था होगी । 
 मैंने कहा " चाचे बस इस साल की तरह  भोलेनाथ चाहें तो हर साल हमारा लंगर अच्छा रहे । 
थोड़ी देर बाद खेम् भाई ने मुझे आवाज  लगाई कि मेरे लिए मेरे किसी बंधु ने प्रशाद छोड़ा है । दोस्तो ये चीनी सुजी वाला प्रशाद मत समझ बैठना। 
वहां काफी देर बिताने के बाद मैं अपने आईपीएच डिपार्टमेंट के पास गया । सारे गच होकर पड़े थे और बड़ीबड़ी फेंक रहे थे । मैंने भी उनको ज्वाइन कर लिया । शाम के पांच बजे हमारे साथ पिछले कल आए महानुभाव हन्नी , विवेक , और जॉनी भईया उर्फ डडवाल भी टपक पड़े । शायद सभी श्रद्धालुओं में ये तीन महान आत्माएं होगी जिन्होंने नौसरा धार से हुडान तक पहुंचने में पूरा दिन लगा दिया । उनको चाय पिलाई और थोड़ी देर बातचीत करके  मैंने उनकी टेंट लगाने में मदद की और उनको आराम करने को बोलकर मैं वापिस आ गया। शाम का वक्त था अंधेरा होने को हो गया पर अब भी इक्का दुक्का श्रद्धालु टपक रहे थे और वो आगे ना जाकर वहां पर अपने तम्बू लगा रहे थे । गडासरू महादेव यात्रा की हिस्ट्री में पहली बार ऐसा हो रहा था कि लोग वहां रुक रहे थे । अब कुछ लोग जो थक्के हुए आए थे उनको हमने कहा कि वो खाना ना बनाएं हमारे पास राशन है तो हम उनके लिए भी बना देंगे । रात का खाना खा कर जिसको जहां जगह मिली वहां सो गए । उस रात खास भजन कीर्तन नहीं हुआ । 
तीसरा दिन:
 अगले दिन फिर से वही कार्यक्रम शुरू हो गया। करीब ग्यारह बजे राणा जटाधारी और भूपी भाई चाय पानी सर्व करके नीचे से आए। राणा जटाधारी अपनी हसी रोक ना सका। हमने उस से उसकी हसी का कारण पूछा तो वह फिल्मी स्टाइल में कहने लगा " अब इसको पागलपन ना बोलें तो क्या बोलें " और बोला
हम जब नीचे पहले चक्कर में गए तो एक मामट्टी खेल (ग्रह्नी) दे रहा था । जब हमने दूसरा चक्कर लगाया तो फिर वही मामटी खेल (ग्रान्हि) में लगा हुआ था। भूपी भाई ने उसको मजाक में कहा "बस कर माम्मट्टी खेल (ग्रानहि) ढाई घड़ी की होती है ये हुड़ान है यहां हर तीसरा बन्दा नीचे से खड़ी चढ़ाई चढ़ कर खेल खेलना शुरू कर देता है । उस माम्मट्टी ने ना आव देखा ना ताव फटाफट अपना झोला उठाया और आगे भाग गया । इस बात को सुन कर हम सब जोर जोर से हंसने लगे। 
 दोपहर तक तो कार्यक्रम ठीक ठाक रहा पर उस दिन रुकने  वाले श्रद्धालु कम थे क्योंकि शाम के वक़्त बारिश शुरू हो गई थी और सब अपने अगले पड़ाव पर पहुंचने की होड़ में थे। बारिश होने की वजह से हमने भी टेंट में रहना उचित समझा और रात तक बारिश होती रही ।  तो कुछ वापिस आ रहे भीगे और थके हुए श्रद्धालु हमारे तम्बू में रुके क्योंकि तम्बू लगाने की हिम्मत उनके पास नहीं बची थी । उस रात  हमारे तम्बू में साठ प्राणी टब्बर हो गया था  । रात के पुलाव और कुछ मैगीज बनाकर हमारे शेफ जब बेले हुए तो उन्होंने एक ओर कहानी डाल दी "भांग के पकोड़े" । वो पकोड़े हम सबने ऐसे खाए की होश हवास गुल हो गई । मैंने तो बिस्तर पकड़ा । पर निहाल जी महाराज कहां मानने वाले  थे । भजन कीर्तन का कार्यक्रम शुरू हो गया । तब तक पकोड़े खा कर हमारे मेहमान भी सेट हो चुके थे । उनके साथ आया हुआ महिला मंडल कहां मानने वाला था । उन्होंने हमारी लंगर कमेटी को ऐसे ऐसे भजन सुनाए जो हमने कभी जिंदगी में नहीं सुने थे । उनके भजनों का आनंद लेते लेते मुझे पता नहीं कब नींद पड़ गई कुछ पता नहीं चला । करीब तीन बजे रात को भूपी भाई की आवाज जोर से कानों में गूंजी "उठो सारे तम्बू के ऊपर पानी भर गया है ये नीचे गिर जाएगा। सबने ये सोचा कि सुबह हो गई। जब सबकी नींद खुली तो देखा सच में एक साइड से तम्बू नीचे आ गया था सारे अपनी अपनी जगह तम्बू को पकड़कर बैठ गए । मैंने और बिट्टू भाई ने एक साइड से तम्बू का पानी निकाला । जब तक हम ये सब करते तब तक सारे गहरी नींद में सो गए थे । बारिश थोड़ी रुकी हम भी दोबारा अपने बिस्तर में बड़ गए । 
चौथा दिन :
सुबह छः बजे के करीब नींद खुली मौसम खराब था । सब उठकर यही बोल रहे थे पता नहीं गाहरू (अगला पड़ाव) वालों के साथ क्या हुआ होगा । पवन चाचे ने कहा किसी ने चलना है डल तक या यहां रुकना है । खेम, मानसिंह, हन्नि, राजू, पवन ,सूखा, धर्मेन्द्र और मैं  तैयार हो गए । एक घंटे में हमने गाहरु लांघ कर डल की ओर बंदर घाटी की चढ़ाई शुरू कर दी।  हम जब ऊपर की ओर चढ़ाई कर रहे थे तो सारे लोग नीचे उतर रहे थे। वो ऐसे उतर रहे थे मानो उनके शरीर में अब जान ना बची हो परंतु सबके मुंह में एक ही मंत्र था ओम नमः शिवाय ! । हमने भी जय शंकर बोलकर उनका होंसला बढ़ाया । हम जल्दी जल्दी ऊपर पहुंचे वहां स्नान किया । स्नान करते वक़्त एक बहुत ही दुखद नज़ारा वहां देखा जिसकी चर्चा हमारी टीम ने की । पवित्र झील के चारों ओर गंदगी, अंडरगार्मेंट्स और ऐसी चीजें जिनका ऐसी जगह पे जिक्र करना भी मैं तो पाप समझता हूं । शायद पिछली रात जो बारिश और तूफान आया था वो भी उसका ही परिणाम था । गढ़ासरू महादेव डल झील के बारे में एक बात मैं तुम्हें बता दू ये वही जगह है जहां पर भोलेनाथ भस्मासुर से बचने के लिए गड़ांत हुए थे और मणिमहेश के धनछो में निकले थे और धानछो झरने के पीछे छुपे थे । जब भी मणिमहेश डल टूटता है चेलो द्वारा तो पहले गड़ासरु झील में पहली डुबकी लगती है उसके बाद मणिमहेश झील में डूबकी लगाई जाती  है  । तो सोचो ऐसी पवित्र जगह को हम जैसे लोगों द्वारा अपवित्र करने से क्या होगा । सन् 2000 - 2001की बात है तब शायद मैं पहली दूसरी में पढ़ता था। उस वक़्त एक आदमी इस झील में डूब गया । जब भी कोई इंसान पानी में डूबता है तो पानी उसकी लाश को अपने से निकाल कर किनारे में फेंक देता है पर आज तक उस इंसान की लाश कभी बाहर नहीं आयी। देव चेलों का तो यहां तक कहना है कि वो इंसान अभी भी जिंदा है और शिवजी की शरण में है । अब इसे आस्था कहें या विश्वास इसे तो साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर भोलेनाथ ही जाने । मेरा तो ये मानना है कि झील शंकुवाकार (conical) होने की वजह से शायद उसकी लाश नीचे चली गई हो या किसी पत्थर में फंस गई हो परंतु इस बात पर कुछ पक्का कहना उचित नहीं है क्योंकि जहां साइंस खत्म होती है वहां से शुरू होती है भोले बाबा की माया। बाकी गड़ासारु महादेव डल झील का नज़ारा तो ऐसा है की हर किसी का दिल मोह ले।  अरे भई ये झील है ही दिल की आकृति की । अगर कोई पांच मिनट तक इसे खुली आंखों से देखे तो उसे इसकी सारी हिस्ट्री जियोग्राफी खुद समझ आ जाएगी । आप इसके पानी को गौर से देखोगे तो आपको ऐसा लगेगा कि इसके पानी के दो हिस्से हैं , काला और नीला । कहते हैं जो काला हिस्सा है उसमें साक्षात् काली माता ( पार्वती माता का रौद्र रूप )  बिराजमान हैं और जो नीला हिस्सा है उसमें साक्षात् भोलेनाथ । इस झील को देख कर ऐसा लगता है जैसे साक्षात् भोलेनाथ अर्धनारीश्वर रूप मेें विराजमान हैं और मेरा मानना यही है । डुबकी लगाना या नहाना सिर्फ चरणों वाली साइड ही होता है । अगर कोई दूसरी साइड से नहाने या डुबकी लगाने की कोशिश करेगा तो शायद वो अपनी बाकी कि जिंदगी खो देगा । महिलाओं का यहां पर नहाना या डुबकी लगाना वर्जित है। महिलाएं झील से थोड़ी नीचे बैरागढ़ वाले रास्ते में पड़ते गौरी कुंड में स्नान कर सकती हैं।  इस झील से थोड़ा ऊपर जाने पर मां भद्रकाली की एक ओर झील है ।उस से थोड़ा ऊपर एक पथरीली खड़ी चढ़ाई चढ़ने पर एक केलांग बज़ीर का डल है । खैर हमने वहां जाना नहीं चाहा क्योंकि वक़्त हो चला था और लगभग सारे पहले वहां जा कर आए थे हनी को अभी  भी  साउथ  के  ब्रह्मानंद  की  तरह  खुजली  लगी  हुई थी  कि ऊपर  जाया  जाए  । उसकी वहाँ  जाने की इच्छा भी  जायज  थी पर वहां ज्यादा देर रुकना उचित नहीं था । देवचेले भी चले गए थे । हमने जल्दी से पूजापाठ किया । चढ़ावा चढ़ाया और वापिस लौट आए । हम इतनी तेजी से आए कि लोग अभी भी बंदर घाटी उतर रहे थे। हमने सबको पीछे छोड़ा और जल्दी से हुडान की ओर प्रस्थान किया । रास्ते में मुझे 
अपना एक मित्र घनु मिला वो अपने सपरिवार यात्रा पर आया था उसकी वाइफ और बचे पीछे थे और एक भारी भरकम बैग जो उसके कंधे पर था । बीवी और बच्चों की चिंता तथा भारी भरकम बैग से थकावट ने उसे मुर्झा दिया था । मैंने उस से वो बैग ले लिया और उसे पीछे आने को कहा । जब तक मैं उस भारी बैग के साथ एक पहाड़ी क्रॉस करता वो अपने परिवार को लेकर सनी देओल की तरह टपक पड़ा । टॉप पर पहुंचकर मैंने थोड़ा विश्राम किया । उसने अपना बैग वापिस ले लिया और हम आगे बढ़े । थोड़ा आगे बढ़ने पर मुझे जित्तू भाई ( मौसेरे भाई ) मिले उनकी बैग उठने में हेल्प की और हुडान की ओर प्रस्थान किया ।  हम अभी पहुंचे ही थे कि बारिश शुरू हो गई । लोग भीगते - भागते नीचे आ रहे थे कुछ ने डेरा हुडान में लगाया कुछ नीचे उतर गए । मेरी और हन्नी की तो मोटी  चमड़ी हमारे वस्त्रों से ऐसे झांक रही थी जैसे दूल्हे के साथ आये सिंगल लौंडे अक्सर दुल्हन की सहेलियों को ताड़ते हैं। हमने भी अपना रात का टूटा तम्बू ठीक किया जिसमें मामाश्री किशोरी ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया । शाम को जनसंख्या साठ से भी ऊपर पहुंच गई । एक मजेदार बात बताना तो भूल गया निहाल जो मेरे साथ यात्रा पर आया था और जिसने पूरे लंगर में रौनक लगा रखी थी हुडान से ही वापिस मूड गया। वो डल तक नहीं पहुंचा । उसने अपने साथ लाई त्रिशूल को वहां गाड़ दिया और जय भोले कहकर वापिस आ गया। उसका कहना था की झील अपवित्र हो चूकी है तो वहां जाना बेकार है। शाम के वक़्त मैंने डडवाल को अपना टेलीफोनुआ घुमाया तो पता चला तो उनकी रोड तक पहुँचते -पहुँचते  उनके चूतड़  लाल हो गए थे।  बारिश ऊपर से इतना लम्बा रास्ता तय कर वो घर तो जैसे तैसे पहुँच गए पर अगले दस दिनों तक उन्होंने बिस्तर से शादी कर  ली थी।   जित्तू भाई (मौसेरे भाई ) जो अपनी अमली गैंग के साथ बैरागढ़ वाले रास्ते से आए थे रात को हमारे पास रुक गए । उस रात उनके हाथ के बने पकोड़े खाए और चिलम  का सेवन किया । रात को खूब एन्जॉय किया और सो गए। 
पांचवा दिन :


सुबह आराम से उठे अपना सारा सामान पैक किया और वापिस आ गए। आते वक़्त जाते वक़्त के मुकाबले ज्यादा थकावट हो रही थी । बारिश की वजह से कीचड़ भी काफी हो गया था और पैर भी फिसल रहे थे। मैंने नंगे पांव चलने का निर्णय लिया । नंगे पांव चलते वक़्त ना तो सर्दी लग रही थी ना ही थकान।  उस वक़्त एक बात समझ में आई " तारने वाला भी वही है डूबोने वाला भी"। ज्वाला पहुंचकर हमने बचे हुए दूध की खीर बनाई और उसको खाकर नीचे उतरने लगे अब धीरे - धीरे संगी साथी अलग हो रहे थे। सारे अपने अपने घर का रास्ता नाप रहे थे। मैंने और हनी ने भी ऐसा किया और घर पहुंचने में रुचि दिखाई। शाम के करीब पांच बजे हम घर पहुंचे। वक़्त था अब मोह माया का जिसे पूरे साल झेलना था पर अभी भी आंखों के सामने गडासरु की सुंदर वादियां ही घूम रही थी और आगे भी घूमती रहेंगी इसी कामना के साथ में अपनी इस कहानी को विराम देता हूं। आशा करता हूं कि आपको ये कहानी मजेदार और रोमांच भरी लगी हो और मैं ये भी आशा करता हूं कि आपकी और भोलेनाथ की किरपा रही तो ऐसी और भी मजेदार कहानियां आपको पढ़ने का मौका मिले जो मेरे द्वारा लिखी गई हों । भोलेनाथ से यही प्रार्थना करूंगा कि वो आपको भी गढ़ासारू यात्रा का मौका दें । 







                  🕉️  जय भोलेनाथ । 🕉️










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